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शुक्रवार, 9 जून 2023

दिल्ली से उठते हैं बादल और हवा में बह जाते हैं

दिल्ली से उठते हैं बादल और हवा में बह जाते हैं

रेत नहाते हुए परिंदे गगन ताकते रह जाते हैं


झुलस-झुलस कर एक-एक कर सारे पीपल ठूँठ हो रहे

भीषण लूओं को ये बरगद जाने कैसे सह जाते हैं


दरबारों में दीन जनों की सुनवाई की जगह नहीं है

फिर भी वे कुर्सी के आगे सिसक-सिसक कर कह जाते हैं


गाँव घेर कर बड़ी हवेली बड़े चौधरी बना रहे हैं

घास-फूस के छप्पर वाले घर तो खुद ही ढह जाते हैं


ओझा-गुनी बड़े आए थे लंबे-चौड़े वादे लेकर

कठिन सवालों के आते ही यह जाते हैं, वह जाते हैं


अम्मा ने कितना समझाया मिलकर रहना ही ताकत है

राजनीति के दावानल में नाजुक रिश्ते दह जाते हैं

(9 जून, 2023)

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