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गुरुवार, 2 जुलाई 2015

पकने लगी फसल, रीझता किसान


पकने लगी फसल, रीझता किसान
जल्दी पकी फसल, रीझता किसान

ली सेठ ने खरीद, पैसे उछाल कर
खेतों खड़ी फसल, रीझता किसान

कर्जा उतर गया, सिर पर लदा हुआ
अच्छी हुई फसल, रीझता किसान

दो रोटियाँ मिलें, दो वक़्त के लिए
कुछ तो बची फसल, रीझता किसान

जो पौध गल गई थी, खाद बन गई
आई नई फसल, रीझता किसान
(137)                               [औरंगाबाद : 30/6/2015: 2307]

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

सारे सपने आधे, जनता परेशान है

सारे सपने आधे, जनता परेशान है
सिर पर कुर्सी लादे, जनता परेशान है

लिए हाथ में लट्ठ अराजक टहल रहे हैं
किसकी मुश्कें बाँधे, जनता परेशान है

जल्लादों की फौज माँगने वोट चली है
इनके भाँप इरादे, जनता परेशान है

अपने हत्यारे चुनने की आज़ादी है
झुके हुए सिर-काँधे, जनता परेशान है

भरे जेब में पत्थर कब से घूम रही है
किस किस के सिर साधे, जनता परेशान है      [136] 

बुधवार, 2 मई 2012

लोक समर्थन के चेहरे पर काजल पोत दिया

लोक समर्थन के चेहरे पर काजल पोत दिया
सहज समर्पण के चेहरे पर काजल पोत दिया

एक बार उसके चेहरे के दाग दिखाए तो
उसने दर्पण के चेहरे पर काजल पोत दिया

राजमुद्रिका शकुंतला से भारी होती है
शुभ्र तपोवन के चेहरे पर काजल पोत दिया

विवश कुन्तियाँ गंगा में कुलदीप सिराती हैं
पूजन अर्चन के चेहरे पर काजल पोत दिया

रिश्ते नातों की मर्यादा के हत्यारों ने
हर संबोधन के चेहरे पर काजल पोत दिया

कुर्सीजीवी संतानों से राजघाट बोला
तुमने तर्पण के चेहरे पर काजल पोत दिया   [135]

पूर्णकुंभ - फरवरी मार्च 2001 - आवरण पृष्ठ 


दुर्दांत दस्यु रखवाले

दुर्दांत दस्यु रखवाले
सब झूठे मन के काले

ये नमक छिडकते पल पल
छिल छिल कर छोलें छाले

पत्तों की पूजा करते
जड, छाछ सींचने वाले

हम मूरख औढरदानी
हमने भस्मासुर पाले

वे लिए गुलेल खड़े हैं
गा ले, कोकिल! तू गा ले  [134]

पूर्णकुंभ - सितंबर 2012 - आवरण पृष्ठ 


मंगलवार, 1 मई 2012

अश्व हुए निर् अंकुश वल्गाएँ ढीली थीं

अश्व हुए निर् अंकुश, वल्गाएँ ढीली थीं
मुँह के बल आन गिरे, राहें रपटीली थीं

कहते हो, आँगन में क्यों धुआँ धुआँ ही है
इस अग्निहोत्र की सब समिधाएँ गीली थीं

आँखें हैं झँपी झँपी औ'  कंठ हुआ नीला
दोपहरी में रवि ने पीडाएँ पी ली थीं

ये कसे हुए जबड़े, ये घुटी हुई चीखें
हैं तनी नसें साक्षी, जिह्वाएँ सी ली थी.

ये लोग न पहचाने सोई चिनगारी को
डिबिया में बंद पड़ी ज्वाला की तीली थीं

यह देख बाँसुरी तुम भ्रम में मत पड जाना
कालिय की फुंकारें हमने ही कीली थीं   [133]

पूर्णकुंभ - अप्रैल 2001  - आवरण पृष्ठ