समर्थक

बुधवार, 2 मई 2012

लोक समर्थन के चेहरे पर काजल पोत दिया

लोक समर्थन के चेहरे पर काजल पोत दिया
सहज समर्पण के चेहरे पर काजल पोत दिया

एक बार उसके चेहरे के दाग दिखाए तो
उसने दर्पण के चेहरे पर काजल पोत दिया

राजमुद्रिका शकुंतला से भारी होती है
शुभ्र तपोवन के चेहरे पर काजल पोत दिया

विवश कुन्तियाँ गंगा में कुलदीप सिराती हैं
पूजन अर्चन के चेहरे पर काजल पोत दिया

रिश्ते नातों की मर्यादा के हत्यारों ने
हर संबोधन के चेहरे पर काजल पोत दिया

कुर्सीजीवी संतानों से राजघाट बोला
तुमने तर्पण के चेहरे पर काजल पोत दिया   [135]

पूर्णकुंभ - फरवरी मार्च 2001 - आवरण पृष्ठ 


दुर्दांत दस्यु रखवाले

दुर्दांत दस्यु रखवाले
सब झूठे मन के काले

ये नमक छिडकते पल पल
छिल छिल कर छोलें छाले

पत्तों की पूजा करते
जड, छाछ सींचने वाले

हम मूरख औढरदानी
हमने भस्मासुर पाले

वे लिए गुलेल खड़े हैं
गा ले, कोकिल! तू गा ले  [134]

पूर्णकुंभ - सितंबर 2012 - आवरण पृष्ठ 


मंगलवार, 1 मई 2012

अश्व हुए निर् अंकुश वल्गाएँ ढीली थीं

अश्व हुए निर् अंकुश, वल्गाएँ ढीली थीं
मुँह के बल आन गिरे, राहें रपटीली थीं

कहते हो, आँगन में क्यों धुआँ धुआँ ही है
इस अग्निहोत्र की सब समिधाएँ गीली थीं

आँखें हैं झँपी झँपी औ'  कंठ हुआ नीला
दोपहरी में रवि ने पीडाएँ पी ली थीं

ये कसे हुए जबड़े, ये घुटी हुई चीखें
हैं तनी नसें साक्षी, जिह्वाएँ सी ली थी.

ये लोग न पहचाने सोई चिनगारी को
डिबिया में बंद पड़ी ज्वाला की तीली थीं

यह देख बाँसुरी तुम भ्रम में मत पड जाना
कालिय की फुंकारें हमने ही कीली थीं   [133]

पूर्णकुंभ - अप्रैल 2001  - आवरण पृष्ठ 

एक बार बहके मौसम में कर बैठा नादानी

एक बार बहके मौसम में कर बैठा नादानी
रह रह कर बह बह जीवन भर कीमत पड़ी चुकानी

एक कटोरी दूध लिए कब से लोरी गाता हूँ
जब से चरखा कात रही है चंदा वाली नानी

जाने कैसे लिख लेते सब रोज़ नई गाथाएँ
इतने दिन से जूझ रहा मैं पुरी न एक कहानी

साँझ घिरे जिसकी वेणी में बरसों बेला गूँथी
पत्थर की यह चोट शीश पर उसकी शेष निशानी

एक शहर था चहल पहल थी आबादी थी घर थे
नई सदी में नदी रोक कर टिहरी पड़ी डुबानी  [132]

पूर्णकुंभ - जनवरी 2002  - आवरण पृष्ठ 

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

छंद छंद गीत का प्रान हो गया

छंद छंद गीत का प्रान हो गया
शब्द शब्द अग्नि का बान हो गया

धुंध चीर कर उगा रक्त सूर्य जो
वेद औ' सनातन कुरान हो गया

बहरों की बातें विधान पर बहस
राजपद गोलघर दुकान हो गया

सुनते हैं अंधों की भीड़ पर अब  
लाठियां चलें प्रावधान हो गया

दिल्ली बाज़ार में ठोकरें पड़ीं
माथे पर काला निशान हो गया

घेर कर फसल घिरे बाज़-टिड्डियां
होरी गुलेल ले मचान हो गया

झील में विष घुला राजनीति का
नीलकंठ गाँव वह  जवान हो गया   [131]

8/1/1982 

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

अग्निहोत्र का दीप बरेगा

अग्निहोत्र का दीप बरेगा
ज्वालाओं का मंत्र वरेगा

उगें अधेरे, लेकिन सूरज
नहीं मरा है, नहीं मरेगा

 रीती पड़ी परात धरा की
तपी भगीरथ पुनः भरेगा

राम बटोही सिंहासन तज
वन प्रांतर का वरण करेगा

मूर्छित पड़ी हुई है पीढ़ी
तू ही शब्द-सुधा बरसेगा!        [130]

1/1/1982