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रविवार, 12 जून 2011

गली गली में शोर है

गली गली में शोर है
कुर्सी वाला चोर है

अंग अंग में पीव, यों
कसक रहा हर पोर है

यह लो, खतरा आ गया
अंबर में घनघोर है

बीच शहर में आ चुका
साँप निगलने मोर है

खून पूर्व में छा रहा
होने वाली भोर है    [120]

6 /11 /1981  

आप कितने पाप लाए

आप कितने पाप लाए
आज तक गिनने न आए

झील खारी हो गई है
आप हैं जब से नहाए

आप थे पत्थर, सुमन ने
व्यर्थ ही आँसू बहाए

आपके होठों हमारा
खून है, छुटने न पाए

आप अब संन्यास ले लें
आग घर में लग न जाए     [119]

6 /11 /1981

ये बड़े जो दीखते हैं

ये बड़े जो दीखते हैं
खून से हम सींचते हैं

एक जुगनू छोड़कर वे
यह अँधेरा चीरते हैं

चीख कर दो चार नारे
शून्य मन  को जीतते हैं

एक विप्लव के विपल में
दमन के युग बीतते हैं

संयमी हम ठोकरें खा
नियम द्रोही सीखते हैं.    [118]

6/11/1981 

दीप से छत जल रही है

दीप से छत जल रही है
आस्था हर छल रही है

गिरगिटी काया पहन कर
रोशनी खुद छल रही है

आँख में आहत सपन की
मौन पीड़ा पल रही है

भूमि के रस कलश सारे
धूप पीती चल रही है

मानसूनी यह हवा अब
सूर्य को क्यों खल रही है

काट दो इस देह से, जो
एक बाजू गल रही है    [117]

6/11 /1981   

गुरुवार, 26 मई 2011

यह मस्ताना, वह मस्तानी, आज चली टोली दीवानी

यह मस्ताना, वह मस्तानी, आज चली टोली दीवानी
बोल मछिंदर, गोपी चंदर, मच्छी मच्छी कित्ता पानी

राज महल का राज़ खोलते, आज मदारी और जमूरे
सावधान सिंहासन-शासन, सावधान हों राजा-रानी

आज नहुष या वेण-कंस हो, नीरो-नूरजहाँ कोई हो
जनता का दरबार लगा है,  करे न कोई आनाकानी

मीनारें-कंगूरे सुन लें,       गुंबद और झरोखे गुन लें
नीवों में भारी हलचल है, कर न बैठना कुछ नादानी

बेमानी हो चुके गगन पर, लिखे रोशनी के सब नारे
अब तो सूरज नया उगाओ, सिर तक आ पहुंचा है पानी    [116 ]

29 अक्टूबर, 1981