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रविवार, 18 मई 2008
सोमवार, 14 जनवरी 2008
सूर्य : दस तेवरियाँ
http://sahityakunj.net/ThisIssue/Ankkavita/Ankkavitani_main01.htm
१
जब नसों में पीढ़ियों की, हिम समाता है
शब्द ऐसे ही समय तो काम आता है
बर्फ पिघलाना ज़रूरी हो गया , चूंकि
चेतना की हर नदी पर्वत दबाता है
बालियों पर अब उगेंगे धूप के अक्षर
सूर्य का अंकुर धरा में कुलबुलाता है
२
बौनी जनता , ऊंची कुर्सी , प्रतिनिधियों का कहना है
न्यायों को कठमुल्लाओं का बंधक बन कर रहना है
वोटों की दूकान न उजड़े , चाहे देश भले उजड़े
अंधी आंधी में चुनाव की , हर संसद को बहना है
टोपी वाले बाँट रहे हैं, मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे
इस बँटवारे को चुप रहकर, कितने दिन तक सहना है
देव तक्षकों के रक्षक हैं ,दूध और विष की यारी
असम, आंध्र , कश्मीर सब कहीं,यही रोज़ का दहना है
हम प्रकाश के प्रहरी निकले ,कलमें तेज़ दुधारी ले
सूरज इतने साल गह चुका, राहु केतु को गहना है
३
घर के कोने में बैठे हो लगा पालथी, भैया जी
खुले चौक पर आज आपका एक बयान ज़रूरी है
झंडों-मीनारों-घंटों ने बस्ती पर हल्ला बोला
चिडियाँ चीखें, कलियाँ चटखें शर संधान ज़रूरी है
मैं सूरज को खोज रहा था संविधान की पुस्तक में
मेरा बेटा बोला -- पापा. रोशनदान ज़रूरी है
जिनके भीतर तंग सुरंगें, अंधकूप तक जाती हैं
उन दरवाजों पर खतरे का, बड़ा निशान ज़रूरी हैं.
४.
यह नए दिन का उजाला देख लो
सूर्य के हाथों में भाला देख लो
धूप बरछी ले उतरती भूमि पर
छँट रहा तम अंध पाला देख लो
भूख ने इतना तपाया भीड़ को
हो गया पत्थर निवाला देख लो
फूटने के पल सिपाही जन रहा
किस तरह हर एक छाला देख लो
शांत था कितने दिनों से सिंधु यह
आज लेता है उछाला देख लो
५.
पसीना हलाल करो
काल महाकाल करो
तेल बना रक्त जले
हड्डियाँ मशाल करो
संगीन के सामने
खुरपी व कुदाल करों
महलों के बुर्जों पर
तांडव बेताल करो
कालिमा को चीर दो
दिशा-दिशा लाल करो
सबसे पहले अब हल
भूख का सवाल करो
६.
लोकशाही के सभी सामान लाएँगे
पाँच वर्षों पूर्व के महमान आएँगे
बर्फ के गोले बनाकर खेलते बच्चे
धूप चोरों को अभी पहचान जाएँगे
भीड़ भेड़ों की सजग है, कुछ नया होगा
खाल ओढे भेड़िए नुकसान पाएँगे
रोष की आंधी चली तो हिल उठी दिल्ली
होशियारी के शिखर नादान ढाएँगे
उग रहा सूरज अँधेरा चीरकर फिर से
रोशनी का अब सभी जयगान गाएँगे
७.
घुला लहू में ज़हर देहली
हत्याओं का शहर देहली
नशे-नहाई हुई जवानी
एक शराबी नहर देहली
दिल की कश्ती को ले डूबी
आवारा सी लहर देहली
खंजर से तन-मन घायल है
ठहर कसाई ठहर देहली
रोज पटाती है सूरज को
नंगी हर दोपहर देहली
रोज़-रोज़ हर गली क़यामत
सड़क-सड़क पर कहर देहली
८
लोगों ने आग सही कितनी
लोगों ने आग कही कितनी
सेंकी तो बहुत बुखारी ,पर
बच्चों ने आग गही कितनी
संसद में चिनगी भर पहुँची
सड़कों पर आग बही कितनी
आंखों में कडुआ धुआं-धुआं
प्राणों में आग रही कितनी
हिम नदी गलानी है, नापें
कविता ने आग दही निकली
९.
हर रात घिरे जलना, हर एक दिवस तपना
अंधियारे युद्धों में किरणों का मर खपना
शब्दों पर हथकड़ियाँ , होठों तालाबंदी
त्रासद अखबारों में सुर्खी बनकर छपना
आँखों में आँज दिया कुर्सी ने धुआँ धुआँ
जनने से पहले ही हर हुआ ज़िबह सपना
अब यहाँ क्रांति-फेरी लगने दो नगर-नगर
यह शांति-शांति माला बस और कहीं जपना
अब उठों जुनूनों से, ज़ुल्मों से जूझ पड़ो
ज्वाला में निखरेगा नचिकेता-मन अपना
१०.
गीत हैं मेरे सभी उनकों सुनाने के लिए
तेवरी मेरी सभी तुमको जगाने के लिए
रक्त मेरा चाहिए तो शौक़ से ले जाइए
सिर्फ़ स्याही चाहिए अक्षर उगाने के लिए
रात सबकी चाँद नी में स्नान कर फूले-फले
यह पसीना ही मुझे काफ़ी नहाने के लिए
धर लिया ज्वालामुखी अब लेखनी की नोंक पर
सूर्य की किरणें चलीं लावा बहाने के लिए
शीत लहरों के शहर में सनसनी सी फैलती
धूप ने कविता लिखी है गुनगुनाने के लिए.
-ऋषभ देव शर्मा
(स्रोत- तेवरी-१९८२, तरकश-१९९६)
१
जब नसों में पीढ़ियों की, हिम समाता है
शब्द ऐसे ही समय तो काम आता है
बर्फ पिघलाना ज़रूरी हो गया , चूंकि
चेतना की हर नदी पर्वत दबाता है
बालियों पर अब उगेंगे धूप के अक्षर
सूर्य का अंकुर धरा में कुलबुलाता है
२
बौनी जनता , ऊंची कुर्सी , प्रतिनिधियों का कहना है
न्यायों को कठमुल्लाओं का बंधक बन कर रहना है
वोटों की दूकान न उजड़े , चाहे देश भले उजड़े
अंधी आंधी में चुनाव की , हर संसद को बहना है
टोपी वाले बाँट रहे हैं, मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे
इस बँटवारे को चुप रहकर, कितने दिन तक सहना है
देव तक्षकों के रक्षक हैं ,दूध और विष की यारी
असम, आंध्र , कश्मीर सब कहीं,यही रोज़ का दहना है
हम प्रकाश के प्रहरी निकले ,कलमें तेज़ दुधारी ले
सूरज इतने साल गह चुका, राहु केतु को गहना है
३
घर के कोने में बैठे हो लगा पालथी, भैया जी
खुले चौक पर आज आपका एक बयान ज़रूरी है
झंडों-मीनारों-घंटों ने बस्ती पर हल्ला बोला
चिडियाँ चीखें, कलियाँ चटखें शर संधान ज़रूरी है
मैं सूरज को खोज रहा था संविधान की पुस्तक में
मेरा बेटा बोला -- पापा. रोशनदान ज़रूरी है
जिनके भीतर तंग सुरंगें, अंधकूप तक जाती हैं
उन दरवाजों पर खतरे का, बड़ा निशान ज़रूरी हैं.
४.
यह नए दिन का उजाला देख लो
सूर्य के हाथों में भाला देख लो
धूप बरछी ले उतरती भूमि पर
छँट रहा तम अंध पाला देख लो
भूख ने इतना तपाया भीड़ को
हो गया पत्थर निवाला देख लो
फूटने के पल सिपाही जन रहा
किस तरह हर एक छाला देख लो
शांत था कितने दिनों से सिंधु यह
आज लेता है उछाला देख लो
५.
पसीना हलाल करो
काल महाकाल करो
तेल बना रक्त जले
हड्डियाँ मशाल करो
संगीन के सामने
खुरपी व कुदाल करों
महलों के बुर्जों पर
तांडव बेताल करो
कालिमा को चीर दो
दिशा-दिशा लाल करो
सबसे पहले अब हल
भूख का सवाल करो
६.
लोकशाही के सभी सामान लाएँगे
पाँच वर्षों पूर्व के महमान आएँगे
बर्फ के गोले बनाकर खेलते बच्चे
धूप चोरों को अभी पहचान जाएँगे
भीड़ भेड़ों की सजग है, कुछ नया होगा
खाल ओढे भेड़िए नुकसान पाएँगे
रोष की आंधी चली तो हिल उठी दिल्ली
होशियारी के शिखर नादान ढाएँगे
उग रहा सूरज अँधेरा चीरकर फिर से
रोशनी का अब सभी जयगान गाएँगे
७.
घुला लहू में ज़हर देहली
हत्याओं का शहर देहली
नशे-नहाई हुई जवानी
एक शराबी नहर देहली
दिल की कश्ती को ले डूबी
आवारा सी लहर देहली
खंजर से तन-मन घायल है
ठहर कसाई ठहर देहली
रोज पटाती है सूरज को
नंगी हर दोपहर देहली
रोज़-रोज़ हर गली क़यामत
सड़क-सड़क पर कहर देहली
८
लोगों ने आग सही कितनी
लोगों ने आग कही कितनी
सेंकी तो बहुत बुखारी ,पर
बच्चों ने आग गही कितनी
संसद में चिनगी भर पहुँची
सड़कों पर आग बही कितनी
आंखों में कडुआ धुआं-धुआं
प्राणों में आग रही कितनी
हिम नदी गलानी है, नापें
कविता ने आग दही निकली
९.
हर रात घिरे जलना, हर एक दिवस तपना
अंधियारे युद्धों में किरणों का मर खपना
शब्दों पर हथकड़ियाँ , होठों तालाबंदी
त्रासद अखबारों में सुर्खी बनकर छपना
आँखों में आँज दिया कुर्सी ने धुआँ धुआँ
जनने से पहले ही हर हुआ ज़िबह सपना
अब यहाँ क्रांति-फेरी लगने दो नगर-नगर
यह शांति-शांति माला बस और कहीं जपना
अब उठों जुनूनों से, ज़ुल्मों से जूझ पड़ो
ज्वाला में निखरेगा नचिकेता-मन अपना
१०.
गीत हैं मेरे सभी उनकों सुनाने के लिए
तेवरी मेरी सभी तुमको जगाने के लिए
रक्त मेरा चाहिए तो शौक़ से ले जाइए
सिर्फ़ स्याही चाहिए अक्षर उगाने के लिए
रात सबकी चाँद नी में स्नान कर फूले-फले
यह पसीना ही मुझे काफ़ी नहाने के लिए
धर लिया ज्वालामुखी अब लेखनी की नोंक पर
सूर्य की किरणें चलीं लावा बहाने के लिए
शीत लहरों के शहर में सनसनी सी फैलती
धूप ने कविता लिखी है गुनगुनाने के लिए.
-ऋषभ देव शर्मा
(स्रोत- तेवरी-१९८२, तरकश-१९९६)
शनिवार, 10 नवंबर 2007
दीपावली : चार तेवरियाँ
१
लो दिवाली की बधाई , मित्रवर !
लो दिवाली की मिठाई ,मित्रवर !
एक दीपक के लिए मुहताज घर
आपने बस्ती जलाई , मित्रवर !
जल चुका रावण, न बुझती है चिता
आग यह कैसी लगाई , मित्रवर !
चौखटों की छाँह तक बीमार है
क्यों हवा ऐसी चलाई , मित्रवर !
अब रहो तैयार लुटने के लिए ,
रोशनी तुमने चुराई , मित्रवर !
हर अँधेरी जेल तोडी जायगी ,
यह कसम युग ने उठाई , मित्रवर !
२
रोशनी जल की परी है , दीपमाला है
रोशनी गिरवीं धरी है , दीपमाला है
कुर्सियों की दीप - लौ में सिंक रही रोटी
पेट की यह नौकरी है ,दीपमाला है
क्यों हँसी को छीन कर इतरा रहे हो तुम ?
आँख में लाली भरी है , दीपमाला है
दुधमुंहों के रक्त में जो स्नान कर आई
रोशनी वह मर्करी है , दीपमाला है
इन पटाखों से जलेगा यह महल ख़ुद ही
आज बागी संतरी है , दीपमाला है
अब सुरंगों में छिपा बारूद जलना है
रोशनी किससे डरी है ! दीपमाला है !!
३
आपकी ये हवेली बड़ी
फुलझडी, फुलझडी, फुलझडी
आपने चुन लिए हार पर
भेंट दीं क्यों हमें हथकडी
आपकी राजधानी सजी
यह गली तो अँधेरी पडी
कुमकुमे , झालरें , रोशनी
हिचकियाँ , आंसुओं की लड़ी
आँख में जल चुके शब्द सब
होंठ पर कील जिनके जड़ी
देखिए , द्वार पर लक्ष्मी
हाथ में राइफल ले खड़ी
भागिए अब किधर जबकि हर
लाश ने तान ली है छड़ी
४
क्या हुआ जो गाँव में घर घर अँधेरा है
सज गई संसद भवन में दीपमाला तो
कुर्सियों की जीवनी में व्यस्त दरबारी
शब्द से चाहे न टूटे बंद ताला तो
आज मेरे स्कूल की छत गिर गई आख़िर
खुल रहीं उनकी विदेशी पाठशाला तो
भील - युवती ने कहा कल ग्राम मुखिया से
मार खाओगे अगर अब हाथ डाला तो
झोंपड़ी पर लिख रहे वे गीत रोमानी
दर्द आंसू पीर सिसकी घाव छाला तो
अब ज़रूरी अक्षरों में आग भरना है
नोंक हो तीखी कलम की तीर भाला तो
:.(स्रोत: तेवरी-१९८२, तरकश-१९९६).:
लो दिवाली की बधाई , मित्रवर !
लो दिवाली की मिठाई ,मित्रवर !
एक दीपक के लिए मुहताज घर
आपने बस्ती जलाई , मित्रवर !
जल चुका रावण, न बुझती है चिता
आग यह कैसी लगाई , मित्रवर !
चौखटों की छाँह तक बीमार है
क्यों हवा ऐसी चलाई , मित्रवर !
अब रहो तैयार लुटने के लिए ,
रोशनी तुमने चुराई , मित्रवर !
हर अँधेरी जेल तोडी जायगी ,
यह कसम युग ने उठाई , मित्रवर !
२
रोशनी जल की परी है , दीपमाला है
रोशनी गिरवीं धरी है , दीपमाला है
कुर्सियों की दीप - लौ में सिंक रही रोटी
पेट की यह नौकरी है ,दीपमाला है
क्यों हँसी को छीन कर इतरा रहे हो तुम ?
आँख में लाली भरी है , दीपमाला है
दुधमुंहों के रक्त में जो स्नान कर आई
रोशनी वह मर्करी है , दीपमाला है
इन पटाखों से जलेगा यह महल ख़ुद ही
आज बागी संतरी है , दीपमाला है
अब सुरंगों में छिपा बारूद जलना है
रोशनी किससे डरी है ! दीपमाला है !!
३
आपकी ये हवेली बड़ी
फुलझडी, फुलझडी, फुलझडी
आपने चुन लिए हार पर
भेंट दीं क्यों हमें हथकडी
आपकी राजधानी सजी
यह गली तो अँधेरी पडी
कुमकुमे , झालरें , रोशनी
हिचकियाँ , आंसुओं की लड़ी
आँख में जल चुके शब्द सब
होंठ पर कील जिनके जड़ी
देखिए , द्वार पर लक्ष्मी
हाथ में राइफल ले खड़ी
भागिए अब किधर जबकि हर
लाश ने तान ली है छड़ी
४
क्या हुआ जो गाँव में घर घर अँधेरा है
सज गई संसद भवन में दीपमाला तो
कुर्सियों की जीवनी में व्यस्त दरबारी
शब्द से चाहे न टूटे बंद ताला तो
आज मेरे स्कूल की छत गिर गई आख़िर
खुल रहीं उनकी विदेशी पाठशाला तो
भील - युवती ने कहा कल ग्राम मुखिया से
मार खाओगे अगर अब हाथ डाला तो
झोंपड़ी पर लिख रहे वे गीत रोमानी
दर्द आंसू पीर सिसकी घाव छाला तो
अब ज़रूरी अक्षरों में आग भरना है
नोंक हो तीखी कलम की तीर भाला तो
:.(स्रोत: तेवरी-१९८२, तरकश-१९९६).:
बुधवार, 10 अक्टूबर 2007
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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2007
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