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शनिवार, 30 अगस्त 2025

हम तनिक सा हिल लें, उन्हें तकलीफ़ होती है

हम तनिक सा हिल लें,
उन्हें तकलीफ़ होती है
ज़रा हम ग़ैर से मिल लें,
उन्हें तकलीफ़ होती है

हमारे बोलने-खाने,
पहनने-सोच पर पहरे
चलो हम होंठ ही सिल लें,
उन्हें तकलीफ़ होती है

उन्हें फागुन नहीं भाता,
न सावन ही सुहाता है
कहो, हम कब-कहाँ खिल लें,
उन्हें तकलीफ़ होती है

मुखौटा बन चुका जिनके,
जटिल अस्तित्व का हिस्सा
तनिक सी छाल भी छिल लें,
उन्हें तकलीफ़ होती है

समंदर से सितारों तक,
उन्हीं की हुक्मरानी है
मगर हम-तुम तनिक तिल लें,
उन्हें तकलीफ़ होती है 000

(हैदराबाद: 31 जुलाई, 2024. )