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रविवार, 3 मई 2009

बोला कभी तो बोल की मुझको सज़ा मिली

बोला कभी तो बोल की मुझको सज़ा मिली
जो चुप रहा तो मौन की मुझको सज़ा मिली

मैं पंक्ति में पीछे खड़ा विराम की तरह
ज़ाहिर है, तेज दौड़ की मुझको सज़ा मिली

की थी दुआ तो शहर में अज्ञातवास की
मैं सैर करूँ भीड़ की मुझको सज़ा मिली

गाईं तो मैंने आपकी प्रशस्तियाँ मगर
आलोचकीय जीभ की मुझको सज़ा मिली

मैंने कहा कि हे प्रभो ! मैं केंचुआ बनूँ
बदले में सीधी रीढ़ की मुझको सज़ा मिली (86)

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