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रविवार, 3 मई 2009

हमलावर शेरों को चिंता में डाला है

हमलावर शेरों को चिंता में डाला है
हिरनी की आँखों में प्रतिशोधी ज्वाला है

सागर में ज्वार उठें, लहरें तेवर बदलें
अवतरित हो रही जो, यह जागृति-बाला है

पृष्ठों पर आग छपी, सनसनी हाशियों पर
अख़बारों ने संध्या-संस्करण निकाला है

सदियों ने बहुत सहा शूली चढ़ता ईसा
हाथों में कील ठुकी, होठों पर ताला है

सड़कों पर उतरी है सुकराती-भीड़ यहाँ
मीरा-प्रह्लादों को प्यारा यह प्याला है (101)

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