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शुक्रवार, 8 मई 2009

जलती बारूद बनो अब बुर्जों पर छाओ रे

जलती बारूद बनो अब बुर्जों पर छाओ रे
हर बुलडोज़र के आगे पर्वत बन जाओ रे

इन खेतों में आँगन को यूँ कब तक बाँटोगे?
मंदिर में सिज़्दे, मस्जिद में प्रतिमा लाओ रे

ये टूटे दिल के नग्मे गाने से क्या होगा?
ज़ालिम मीनारें टूटें कुछ ऐसा गाओ रे

'गा' गोली, 'बा' बंदूकें, 'खा' से खून-पसीना
'रा' रोटी, 'आ' आग और 'ला' लहू पढ़ाओ रे

अब और न तश्तरियों में यह ज़िन्दा मांस सजे
रोटी के हक़ की ख़ातिर तलवार उठाओ रे [106]

2 टिप्‍पणियां:

ravikumarswarnkar ने कहा…

बेहद प्रभावी और आह्वानकारी ग़ज़ल...
ऐसा आंदोलनकारी आनंद आजकल दुर्लभ हो रहा है....

रवि ने कहा…

मंदिर में सिज़्दे और मस्जिद में प्रतिमा लाओ रे...

आज की ज़रूरत. कमाल की ग़ज़ल