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रविवार, 12 जून 2011

आप कितने पाप लाए

आप कितने पाप लाए
आज तक गिनने न आए

झील खारी हो गई है
आप हैं जब से नहाए

आप थे पत्थर, सुमन ने
व्यर्थ ही आँसू बहाए

आपके होठों हमारा
खून है, छुटने न पाए

आप अब संन्यास ले लें
आग घर में लग न जाए     [119]

6 /11 /1981

1 टिप्पणी:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

बढिया तेवरी सर जी।

हम तो संन्यास लिए बैठे है
घर में आग का इंतेज़ार किए बैठे हैं :)