समर्थक

शनिवार, 25 जून 2011

गन्ने की पोर में विष कौन भर गया?

गन्ने की पोर में विष कौन भर गया
जिसने भी रस पिया पीते ही मर गया

कोल्हू में आ गया कर्जा उतारने
बस रह गया वहीं वापस न घर गया

बोगी में लादकर कुछ लोग चल दिए
पौ फटते काफिला मिल के नगर गया

चंपा के हाथ में हाँसी दरांतियाँ
अचपल को पलकटी देकर किधर गया

अब और तान कर कंकड़ न फेंकिए
लहरों के शोर से तालाब भर गया   [122 ]

10 /11 /1981  

1 टिप्पणी:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

कोल्हू का बैल चाहे जितने चक्कर लगा लें, रह तो वहीं जाता है... उसका जीवन तो कर्ज़ तले दबा है मरते दम तक॥