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शनिवार, 25 जून 2011

गूंगों के गाँव में अंधों का राज है

गूँगों के गाँव में अंधों का राज है
चिड़िया दबोचता पजों में बाज़ है

कमज़ोर हाथ वे पतवार खे रहे
लहरों में डोलता इनका जहाज़ है

लो चल पडी हवा छाती को चीरती
मौसम ने आज फिर बदला मिज़ाज है

अंबर में फिर कहीं बिजली चमक उठी
तांडव के राग में य' किसका साज़ है

गिद्धों की मच गई हर ओर चीत्कार
लगता है गिर रही बरगद प' गाज है     [123 ]

10 /11 /1981



3 टिप्‍पणियां:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

बरगद बूढ़ा हो चला तो गाज गिरना ही है :)

राकेश कौशिक ने कहा…

"गूँगों के गाँव में अंधों का राज है"

उमेश महादोषी ने कहा…

कई तेवरियां पढ़ीं। वही पुराने तेवर, वही रचनात्मकता देखकर अच्छा लगा।