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रविवार, 12 जून 2011

दीप से छत जल रही है

दीप से छत जल रही है
आस्था हर छल रही है

गिरगिटी काया पहन कर
रोशनी खुद छल रही है

आँख में आहत सपन की
मौन पीड़ा पल रही है

भूमि के रस कलश सारे
धूप पीती चल रही है

मानसूनी यह हवा अब
सूर्य को क्यों खल रही है

काट दो इस देह से, जो
एक बाजू गल रही है    [117]

6/11 /1981   

2 टिप्‍पणियां:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

पुरानी तेवरी पर नये तेवर ... सच है, आज आस्था छली गई है :(

डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee ने कहा…

तेवरियों के तो हम प्रशंसक हैं ही, इसलिए बिना कहे हमारी वाह-वाह सम्मिलित मानी जाए |