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रविवार, 12 जून 2011

गली गली में शोर है

गली गली में शोर है
कुर्सी वाला चोर है

अंग अंग में पीव, यों
कसक रहा हर पोर है

यह लो, खतरा आ गया
अंबर में घनघोर है

बीच शहर में आ चुका
साँप निगलने मोर है

खून पूर्व में छा रहा
होने वाली भोर है    [120]

6 /11 /1981  

2 टिप्‍पणियां:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

सरकारी ज़ुल्म पीप और पोर पोर में दर्द ही तो दे पाएंगे :(

सुधीर ने कहा…

सुंदर रचना .