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रविवार, 15 मई 2011

जनता की अदालत लगी, इन्साफ कीजिए

जनता की अदालत लगी, इन्साफ कीजिए
संसद कटहरे में खडी, इन्साफ कीजिए

सुविधाएँ भोगते हैं वे शासन के नाम पर
भूखे से बुधिया मर गई, इन्साफ कीजिए

उनके भतीजे ले रहे हर एक लाइसेंस
इनको न रोजी मिल सकी, इन्साफ कीजिए

कुर्सी की खींचतान में गांधी की आत्मा
लोहूलुहान हो रही, इन्साफ कीजिए

सारे सफेदपोश डकैतों के वास्ते
है कौन सी सज़ा सही, इन्साफ कीजिए   [113]

                                      17 अक्टूबर , 1981  

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