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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

कुर्सी बनी कुलदेवता

कुर्सी बनी कुलदेवता
कुर्सी बनी कुल - देवता इस खानदान की
तर हैं हमारे रक्त से सीढ़ी मकान की

वधुएँ हुईं कुलटा यहाँ बचकर चलो ज़रा
छल ले न तुमको भी कहीं रौनक दुकान की

नारे लगाएँ आप भी या मौन हो रहें
क्या है ज़रूरी सोचिए रक्षा ज़ुबान की?

लिखने को लिख रहे सभी दिन - रात एक कर
कितने लिखेंगे किंतु यह पीड़ा विधान की?

वे आँख में कुणाल की तकुए गुभो (पिरो) रहे
तुम खींच लो अब कान तक डोरी कमान की

हर बुर्ज पर बैठी हुई , दूती विनाश की
तनने दो यूँ गुलेल अब , हर इक मचान की [ ६९ ]

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