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रविवार, 31 जुलाई 2011

युधिष्ठिरी-यात्रा के नग हैं

युधिष्ठिरी-यात्रा के नग हैं
व्रण-छालों से छाए पग हैं

रोती रहे न्याय की पुस्तक
कुर्सी के क़ानून अलग हैं

बाज़ों के पंजे घातक, पर
बागी आज युयुत्सु विहाग हैं

तूफानी धाराएँ मचलीं
कागज़ की नावें डगमग हैं

शंखनाद गूँजा, मंदिर की
दीवारों के कान सजग हैं     [127]

20 नवंबर 1981

घर बगिया खलिहान सजग हैं

घर बगिया खलिहान सजग हैं
दीवारों के कान सजग हैं

चुग न सकोगे मेरी फसलें
जब तक खड़े मचान सजग हैं

शीश महल के स्वप्न बिखरते
कच्चे सभी मकान सजग हैं

चक्र व्यूह शोषण के टूटें
तीखे तीर कमान सजग हैं

भाग्य विधाता! अधिनायक! सुन;
जन गण के जय गान सजग हैं!!    [126]

20 नवंबर 1981  

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

कल धमाके में मरा जो, कौन था? पूछा जभी

'कल धमाके में मरा जो , कौन था?'  पूछा जभी
यों सुबह बोली सहम कर, 'एक भोला आदमी'

हो गया साबित बहुत हल्का सभी के सामने
यार! जब सच की तुला में आज तोला आदमी

भर दिया बारूद तुमने खाल में उसकी स्वयं
क्यों शिकायत यदि पटाखा और गोला आदमी

एक कोने से मसर्रत, एक कोने से रमा
देखते युग की हथेली पर फफोला आदमी

हर शिरा में साँप पाए, आँत में बिच्छू मिले
धर्म के कपडे हटा जब चीर खोला आदमी

रोटियाँ तो मिल न पाईं  आपकी बंदूक से
और कब तक खा सकेगा गर्म शोला आदमी     [125]

हो गया है देखिए कितना कमीना आदमी

हो गया है देखिए कितना कमीना आदमी
यह घड़ा है देखिए चिकना कमीना आदमी

लाल नीली पगड़ियाँ औ' धवलवर्णी टोपियाँ
ओढ़, चूनर छीनता फ़ितना कमीना आदमी

बालकों का खून पीता, औरतों को नोचता
आदमी को लूटता  इतना कमीना आदमी

डाकखाने खा रहे यूँ चिट्ठियों को, बेशरम
दोस्त जासूसी करें, लिखना - कमीना आदमी  

हर सड़क को हाथ में खंजर थमाना ही पड़ा
दूसरा कोई नहीं जितना कमीना आदमी     [124]

09 /07 /1982